हिन्दी साहित्य को सम्मानित करने की कोशिश में एक छोटा सा प्रयास, हिन्दी की श्रेठ कविताओं, ग़ज़लों, कहानियों एवं अन्य लेखों को एक स्थान पर संकलित करने की छोटी सी कोशिश...

Harishankar Parsai - Naya Saal | हरिशंकर परसाई - नया साल | Vyangya

नया साल २०१५ बस शुरू होने को है और फिर से एक बार बधाइयों का तांता लग जायेगा।  आप अपने लिए कुछ लक्ष्य बना लेंगे नए साल के लिए और जनवरी के खत्म होने के पहले ही आप उनको भूल भी जायेगे। ऐसी ही कुछ मनोरंजक बातों से भरा हरिशंकर परसाई जी का यह व्यंग्य आज भी कारगर है।  नया साल आपके लिए मंगलमय हो इसी आकांक्षा से आपके लिए प्रस्तुत है "नया साल" :)

Premchand - Boodi Kaki | प्रेमचंद - बूढ़ी काकी | Story

बुढ़ापा बहुधा बचपन का पुनरागमन हुआ करता है। बूढ़ी काकी में जिह्वा-स्वाद के सिवा और कोई चेष्टा शेष न थी और न अपने कष्टों की ओर आकर्षित करने का, रोने के अतिरिक्त कोई दूसरा सहारा ही। समस्त इन्द्रियाँ, नेत्र, हाथ और पैर जवाब दे चुके थे। पृथ्वी पर पड़ी रहतीं और घर वाले कोई बात उनकी इच्छा के प्रतिकूल करते, भोजन का समय टल जाता या उसका परिणाम पूर्ण न होता अथवा बाज़ार से कोई वस्तु आती और न मिलती तो ये रोने लगती थीं। उनका रोना-सिसकना साधारण रोना न था, वे गला फाड़-फाड़कर रोती थीं।

Majrooh Sultanpuri - Mujhe Sahal Ho Gayi Manzile | मजरूह सुल्तानपुरी - मुझे सहल हो गईं मंज़िलें वो हवा के रुख भी बदल गए | Ghazal

मुझे सहल हो गईं मंज़िलें वो हवा के रुख भी बदल गए
तेरा हाथ हाथ में आ गया कि चिराग राह में जल गए

Bhisham Sahni - Jhoomar | भीष्म साहनी - झूमर | Story

खुले मैदान में अर्जुनदास कुर्सी पर बैठा सुस्ता रहा था। मैदान में धूल में उड़ रही थी, पाँवों को मच्छर काट रहे थे, उधर शाम के साए उतरने लगे थे और अर्जुनदास का मन खिन्न–सा होने लगा था। 

जिन बातों ने जिंदगी भर परेशान नहीं किया था, वे जीवन के इस चरण में पहुँचने पर अंदर ही अंदर से गाहे–बगाहे कचोटने–कुरेदने लगती थी। अनबुझी–सी उदासी, मन पर छाने लगती थी। कभी–कभी मन में सवाल उठता, अगर फिर से जिंदगी जीने को मिल जाती तो उसे मैं कैसे जीता? क्या करता, क्या नहीं करता? यह तय कर पाने के लिए भी मन में उत्सुकता नहीं थी। थका–थका सा महसूस करने लगा था। 

Jaishankar Prasad - Kala | जयशंकर प्रसाद - कला | Short Story

उसके पिता ने बड़े दुलार से उसका नाम रक्खा था-'कला'। नवीन इन्दुकला-सी वह आलोकमयी और आँखों की प्यास बुझानेवाली थी। विद्यालय में सबकी दृष्टि उस सरल-बालिका की ओर घूम जाती थी; परन्तु रूपनाथ और रसदेव उसके विशेष भक्त थे। कला भी कभी-कभी उन्हीं दोनों से बोलती थी, अन्यथा वह एक सुन्दर नीरवता ही बनी रहती।

Premchand - Gulli Danda | प्रेमचंद - गुल्ली डंडा | Story

हमारे अंग्रेजी दोस्त मानें या न मानें मैं तो यही कहूंगा कि गुल्ली-डंडा सब खेलों का राजा है। अब भी कभी लड़कों को गुल्ली-डंडा खेलते देखता हूँ, तो जी लोट-पोट हो जाता है कि इनके साथ जाकर खेलने लगूँ। न लान की जरूरत, न कोर्ट की, न नेट की, न थापी की। मज़े से किसी पेड़ से एक टहनी काट ली, गुल्ली बना ली और दो आदमी भी आ जाएँ तो खेल शुरू हो गया।

Mahadevi Varma - Binda | बिन्दा | महादेवी वर्मा | Story

भीत-सी आंखोंवाली उस दुर्बल, छोटी और अपने-आप ही सिमटी-सी बालिका पर दृष्टि डाल कर मैंने सामने बैठे सज्जन को, उनका भरा हुआ प्रवेशपत्र लौटाते हुए कहा-'आपने आयु ठीक नहीं भरी है। ठीक कर दीजिए, नहीं तो पीछे कठिनाई पड़ेगी।' 'नहीं यह तो गत आषाढ़ में चौदह की हो चुकी' सुनकर मैने कुछ विस्मित भाव से अपनी उस भावी विद्यार्थिनी को अच्छी तरह देखा, जो नौ वर्षीय बालिका की सरल चंचलता से शून्य थी और चौदह वर्षीय किशोरी के सलज्ज उत्साह से अपरिचित।

Sharad Joshi - Rail Yatra | रेल-यात्रा | शरद जोशी | Vyangya | व्यंग्य

रेल विभाग के मंत्री कहते हैं कि भारतीय रेलें तेजी से प्रगति कर रही हैं। ठीक कहते हैं। रेलें हमेशा प्रगति करती हैं। वे बम्‍बई से प्रगति करती हुई दिल्‍ली तक चली जाती हैं और वहाँ से प्रगति करती हुई बम्‍बई तक आ जाती हैं। अब यह दूसरी बात है कि वे बीच में कहीं भी रुक जाती हैं और लेट पहुँचती हैं। पर अब देखिए ना, प्रगति की राह में रोड़े कहाँ नहीं आते। कांग्रेस के रास्‍ते में आते हैं, देश के रास्‍ते में आते हैं तो यह तो बिचारी रेल है। आप रेल की प्रगति देखना चाहते हैं तो किसी डिब्‍बे में घुस जाइए। बिना गहराई में घुसे आप सच्‍चाई को महसूस नहीं कर सकते।

Gulzar - Bas Ek Lamhe Ka Jhagda Tha | बस एक लम्हे का झगड़ा था | गुलज़ार | Poem

बस एक लम्हे का झगड़ा था
दर-ओ-दीवार पे ऐसे छनाके से गिरी आवाज़
जैसे काँच गिरता है

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