हिन्दी साहित्य को सम्मानित करने की कोशिश में एक छोटा सा प्रयास, हिन्दी की श्रेठ कविताओं, ग़ज़लों, कहानियों एवं अन्य लेखों को एक स्थान पर संकलित करने की छोटी सी कोशिश...

Sudarshan - Andhkaar | सुदर्शन - अंधकार | Story

हिन्दी के प्रसिद्ध लेखक सुदर्शन जी की यह कहानी पुत्र लोभ की आकांक्षा लिए हुए एक ऐसे परिवार की है जहाँ स्त्रियों का सम्मान इस बात पर निर्भर है की वह पुत्र आकांक्षा को पूर्ण कर पाती है या नहीं। यह कहानी आपके मन को झंझोर कर रख देती है।


लाला रामनारायण अमृतसर के प्रसिद्ध व्‍यापारी थे, मिट्टी को भी हाथ लगाते तो सोना हो जाता। उन पर लक्ष्‍मी की विशेष कृपा थी - उनकी दो दुकानें थीं, एक कपड़े की, दूसरी अंग्रेजी दवाइयों की। उन्‍हें दोनों से मुनाफा होता था। किसी वस्‍तु का टोटा न था। भगवान ने सब कुछ दिया था, मगर कुछ भी न था। उनके लड़कियाँ कई थीं, लड़का एक भी न था। यह पुत्र अभाव उन्‍हें खाए जाता था, हर समय उदास रहते थे। बाहर जा कर तो कदाचित हँस-बोल भी लेते, पर घर में आते ही उनकी आँखें अग्निमय हो जाती थीं।
पार्वती समझती थी, इसमें मेरा कोई दोष नहीं। अब लड़के-लड़कियाँ पैदा करना किसी के अपने बस की बात थोड़े ही है? परंतु इस पर भी उसमें इतना साहस न था कि पति के सामने मुस्‍कराते हुए खड़ी हो जाए। वह घर में आते थे तो थर-थर काँपती रहती कि कहीं गरज न उठें। सोचती, मेरे ही भाग्‍य में आग लगी है, इसमें किसी का दोष नहीं। लोगों के यहाँ कई-कई लड़के पैदा होते हैं, पत्‍थरों के लिए मैं ही रह गई हूँ। सास कहती, मेरे मोती जैसे बेटे को अभागिन मिल गई। चेहरा कैसा दमकता था, जैसे अनार का लाल दाना हो। पर अब वह बात ही नहीं। न होंठों पर वह मुस्‍कान है, न आँखों में वह ज्‍योति। देह पहले से आधी भी नहीं रही। अंदर-ही-अंदर घुला जाता है। रामनारायण यह बातें सुनते तो और भी दुखी हो जाते। कहते - "माँ! तुम ऐसी बातें न किया करो। जो वस्‍तु भाग्‍य में न लिखी हो, उसके लिए रोना निष्‍फल है। मैंने समझ लिया है, हमारे वंश का नाम-निशान मिट के रहेगा, हमारे भाग्‍य में पुत्र-सुख नहीं लिखा। तुम कुढ़ती हो, मुझे रोना आता है।"

पार्वती यह बातें सुनती तो उसके दिल में तीर चुभ जाते। पहरों रोती और प्रारब्‍ध को गालियाँ देती रहती। वह भागवान घर में आई थी, पर अभागिन बन कर, जैसे खीर के थाल में लाल मर्च पड़ जाए। उसे और सारे सुख थे, एक यही न था। उसने इलाज किया, साधु - संतों से भस्‍म की चुटकी ली, व्रत रखे मगर भाग्‍यरेखा न बदली। यहाँ तक कि कई वर्ष बीत गए, परंतु पार्वती का आशा अंक पुत्र-मणि से न भरा। लड़कियाँ चार थीं, लड़का एक भी न था।


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एक दिन गली में एक ज्‍योतिषी आया। बच्‍चों के लिए रीछ और स्त्रियों के लिए ज्‍योतिषी दोनों समान हैं। स्त्रियों को तमाशा हाथ लग गया। बढ़-चढ़ कर हाथ दिखाने लगीं। ज्‍योतिषी बातें बनाता था, पैसे बटोरता था। कैसा अच्‍छा व्‍यापार है! किसी का माल नहीं बिकता, किसी की बातें बिकती हैं। स्त्रियाँ पैसे देती थीं और हँसती थीं। मगर पार्वती घर बैठी अपने दुर्भाग्‍य को रो रही थी।

इतने में उसकी सास ने कहा - "पार्वती! जरा इधर आ कर तू भी पंडितजी को हाथ दिखा ले।"
पार्वती ने नैराश्‍य भाव से उत्‍तर दिया - "हाथ दिखाने से क्‍या होगा?"
"मगर हर्ज ही क्‍या है? दिखा ले।"

पार्वती का जी न चाहता था कि हाथ दिखाए, परंतु सास के भय से उसने उठ कर हाथ ज्‍योतिषी के सामने कर दिया। सब स्त्रियाँ चुपचाप खड़ी हो गईं। यह हस्‍त-निरीक्षण न था, भाग्‍य-निरीक्षण था। ज्‍योतिषी ने हाथ की रेखाओं को देखा और कहा - "तुम्‍हारे मन में हमेशा क्‍लेश रहता है।"

पार्वती की सास ने सिर हिला कर कहा - "ठीक है पंडितजी।"
ज्‍योतिषी - "पर यह क्‍लेश मन का है, शरीर का नहीं।
सास - "यह भी सच है।"
ज्‍योतिषी - "इसके कन्‍याएँ होती हैं, लड़का नहीं होता।"
स्त्रियों ने कहा - "देखा! यह विद्या की बातें हैं। जो चार अच्‍छर पढ़ जाते हैं, वह कहते हैं, जोतस-सासतर सब झूठ हैं। अब कहो, सच बताया या नहीं?"
ज्‍योतिषी - "इसका पति भी बहुत दुखी रहता है।"
सास - "महाराज, यह भी सच है।"
ज्‍योतिषी - "इसके लिए नच्‍छत्‍तर तो सब अच्‍छे हैं, केवल एक नच्‍छतर अशुभ है। यह सब उसका फल है।"
सास - "महाराज तो अंतरजामी हैं। अब यह देखें इसके भाग में बेटा है या नहीं।"
ज्‍योतिषी ने अच्‍छी तरह देख कर उँगलियों पर हिसाब किया और इसके बाद शोक से सिर हिला कर कहा - "नहीं।"

उत्‍तर साधारण था, पर पार्वती का दिल दहल गया। उसकी देह से पसीना छूटने लगा, जैसे जीवन की सकल आशाएँ और उमंगें प्रस्‍थान कर गई हों। उसने हतभागों की तरह भूमि की ओर देखा और रुक-रुक कर पूछा - "इसका कुछ उपाय भी है, या नहीं?"

ज्‍योतिषी - "उपाय तो है, परंतु बड़ा कठिन है।"
पार्वती - "मैं सब कुछ कर लूँगी।"
ज्‍योतिषी - "रात को श्‍मशान में बैठ कर जाप करना होगा। कर सकोगी?"

पार्वती का चेहरा फीका पड़ गया। आशा सामने आई थी, ओझल हो गई। पार्वती फिर उदास हो गई, जैसे कोई बाजी जीतते-जीतते हार गई।

ज्‍योतिषी - "तुम उदास न हो। तुम्‍हारी खातिर यह काम मैं कर दूँगा। भय बहुत है, सिद्धि के समय भूत सामने आ कर खड़े हो जाते हैं। अनजान आदमी सहम कर मर जाए। परंतु भूत हमारा क्‍या बिगाड़ लेंगे, चाहें तो पल-भर में भस्‍म कर दें। हमारे शब्‍दों में आग है। एक मंत्र पढ़ें तो चिल्‍ला कर भाग निकलें।"

पार्वती की आँखें आशापूर्ण हो गईं, जैसे देवी का वरदान मिल गया हो। सास का चेहरा आशा की आभा से लाल था। उसे विश्‍वास हो गया कि अब जरूर लड़का होगा। करामाती पंडित रेख में मेख मार सकता है। ज्‍योतिषी जी की खातिर होने लगी। उसने जो कुछ माँगा वही दिया। पार्वती और उसकी सास न नहीं करती थीं। कभी काले बकरे के लिए रुपए माँगता, कभी सोने-चाँदी के लिए। उसे आज तक न ऐसा अमीर घर मिला था, न ऐसे अंधे श्रद्धालु। दोनों हाथों से लूटता था। और वह लुटवाते थे। हर मंगलवार को गरीबों में रोटियाँ बाँटी जाती थीं। ज्‍योतिषी जी ने पार्वती को एक मंत्र सिखा दिया था। वह नहा कर पंद्रह मिनट जाप करती थी। खाना भूल सकता था, मगर इस मंत्र का जाप न भूल सकता था। अब इस मंत्र ही पर जीवन की सारी अभिलाषाएँ अवलंबित थीं। सदा शंका लगी रहती कहीं यह कच्‍चा तागा टूट न जाए। वह इसे प्राणपण से बचा कर रखती थी, यहाँ तक कि मंत्र की परीक्षा का दिन समीप आ गया। अब कुछ दिन बाकी थे।

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पार्वती की रात-दिन खातिरदारियाँ होने लगीं। घर के लोग उसे कोई काम न करने देते थे, कहते आराम से बैठी रहो, सब कुछ हो जाएगा। लाला रामनारायण ने कभी उससे सीधे मुँह बात न की थी। अब हँस-हँस कर बोलने लगे, जैसे उससे मन-मुटाव था ही नहीं। मुँह हर समय खिला रहता। पार्वती को कभी ताँगे की सैर कराने ले जाते, कभी थियेटर दिखाने। कहते, जो जी में आए माँग लिया करो, मन मान कर रह जाना स्‍वास्‍थ्‍य को खराब कर देता है। पार्वती को यह नौ महीने गुजरते मालूम न हुए। संसार के सारे सुख, सारे आराम पर्याप्‍त थे। जो कहती, वही हो जाता। किसी को दम मारने की मजाल न थी। पहले दासी थी अब रानी बनी। सास, जो दिन-रात हृदय-बेधी ताने मारती थी, अब ऊँची आवाज से बोलते हुए भी डरती थी। कहीं पार्वती क्रोध न कर बैठे, कहीं उसका जी न खराब हो जाए। पार्वती की ऐसी खातिर, ऐसी खुशामद कभी न हुई।

एक दिन रामनारायण बोले - "ज्‍योतिषी कहता है, सौ रुपए से एक भी पैसा कम न लूँगा।"
पार्वती - "वह समय तो आ ले, देखा जाएगा।"
रामनारायण - "मेरा दिल कहता है, अब के लड़का ही होगा।"
पार्वती - "लच्‍छन तो मुझे भी अच्‍छे मालूम होते हैं। दिल में ऐसे-ऐसे विचार आते हैं कि तुमसे क्‍या कहूँ?"
रामनाराण - "बस, ठीक है। लड़का ही होगा।"
पार्वती - "जी चाहता है, फल और मिठाइयाँ ही खाती रहूँ। रोटी की तरफ देखने से भी घृणा होती है।"
रामनारायण - "खटाई पर तो दिल नहीं दौड़ता?"
पार्वती - "कभी खयाल भी नहीं आता।"
रामनारायण - "जी कैसा रहता है?"
पार्वती - "बहुत प्रसन्‍न। पहले सदा उदासी छाई रहती थी। अब सुस्‍ती नाम को नहीं। जी चाहता है, सारा दिन सैर किया करूँ। ऐसी दशा मेरी आज तक कभी न हुई थी।"
रामनाराण - "मेरा दिल भी यही कहता है कि अब की जरूर लड़का ही होगा।"
पार्वती - (हँस कर) "अगर लड़का हुआ तो मुझे क्‍या दोगे?"
रामनारायण - "जो माँगोगी, वही दँगा। तुमसे बाहर थोड़े हूँ।"
पार्वती - "हीरे का हार मँगवा दोगे?"
रामनारायण - "अरे! हीरे का हार?"
पार्वती - "बस, बस! इतना ही देखना था देख लिया।"
रामनारायण - "तुम तो वकीलों की तरह जिरह करती हों।"
पार्वती - "चलो रहने दो। मैं तुम्‍हारा दिल देखती थी। मुझे हार की क्‍या पड़ी है? तुम्‍हारी खुशी मिल जाए, यही सब कुछ है।"
रामनारायण - "मैं तुमसे कभी नाराज नहीं हुआ।"
पार्वती - "क्‍यों झूठ बोलते हो? तुम्‍हारी तो आँखें ही बदल गई थीं। मैं अनपढ़ हूँ, पर अंधी नहीं हूँ। आँखें पहचानती हूँ।"
रामनारायण - "तुम्‍हें धोखा हुआ होगा।"
पार्वती - "खैर! यह भी देखा जाएगा।"

इसी तरह नौ महीने बीत गए। प्रसव-काल आ पहुँचा। रामनारायण बाहर बैठे घबराते थे, उनकी माँ अंदर घबराती थीं। ज्‍यों-ज्‍यों समय गुजरता जाता था, उसकी उत्‍सुकता बढ़ती जाती थी। देखें क्‍या हो, क्‍या न हो? चेहरे का रंग क्षण-क्षण में बदल रहा था। कभी आशा, कभी निराशा, कभी व्‍याकुलता। उनकी सकल इच्‍छाएँ, समस्‍त उल्‍लास, सारे उद्गार आँखों में आ बैठे थे। उनके जीवन का आधार अब केवल एक शब्‍द पर था। यह खेती एक छींटे की प्‍यासी थी। यह लता एक झोंके की भूखी थी।

सहसा अंदर से नवजात बालक के रोने की आवाज आई। रामनारायण चौंक कर खड़े हो गए और सवेग अंदर को चले। वे अभी आँगन ही में पहुँचे थे कि माँ बाहर निकल आई। इस समय उसकी आँखों में आँसू थे, मुँह पर क्रोध, जैसे अग्नि की ज्‍वाला में पानी की बूँदें जल रही हों। रामनाराण के पाँव वहीं रुक गए। अब उनमें आगे बढ़ने की शक्ति न थी। यह लंबा सफर, यह सुदूर यात्रा कितनी आशाओं को ले कर तय की थी। सब निराशा की भेंट हो गई। हृदय क्षेत्र को पानी का छींटा न मिला। आशालता को वायु का झोंका प्राप्‍त न हुआ।

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फिर लड़की। रामनारायण का सिर चकराने लगा। निराशा जब चरम-सीमा पर पहुँच जाती है तो हमारी जीभ बंद हो जाती है। रामनारायण भी चुप हो गए। बहुत देर के बाद बोले - "अब तो जी चाहता है, कहीं निकल जाऊँ, यहाँ मेरे दिल को शांति न मिलेगी।"

माँ - "धीरज धरो। घबराने से क्‍या होता है?"
रामनारायण - "वह ज्‍योतिषी मिल जाए तो मुँह नोच लूँ। मुझे तो उस पर पहले ही विश्‍वास न था, मगर तुम्‍हारे खयाल से चुप रहा। हजारों पर पानी फिर गया।"
माँ - "मुझे क्‍या पता था, धोखा ही धोखा है।"
रामनारायण - "कहता था, जाप करूँगा तो लड़का हो जाएगा। सब वाहियात ढकोसले हैं। ऐसे महात्‍मा होते तो माँगते क्‍यों फिरते? घर बैठे पाँव पुजवाते।"
माँ - "बेटा! जब अपने ही कर्मों में न हो तो कोई क्या करे? आदमी तो बुरा न था। जो-जो बात थी, खोल कर कह दी। सारा मुहल्‍ला वाह-वाह करता था। एक यह बात झूठ निकली। बाकी सब सच निकला।"
रामनारायण - "हमारे भाग ही खोटे हैं। अब मुझे आज्ञा दो, साधु हो कर कहीं निकल जाऊँ। घर में रहा तो पागल हो जाऊँगा।"
माँ - "कैसी बातें मुँह से निकालते हो तुम? भाग तुम्‍हारे क्‍यों खोटे होने लगे? भाग उस अभागिनी के खोटे हैं, जिसे राज-सिंहासन पर बैठ कर भी आराम न मिला। मेरी मानो तो अब दूसरा ब्‍याह कर लो, इससे लड़का न होगा। बहुत बरदाश्‍त किया, अब नहीं सहा जाता।"
रामनारायण - "मैं मर जाऊँगा, पर यह न करूँगा। मैं आदमी हूँ, राक्षस नहीं हूँ।"
माँ - "अरे! मैं उसे घर से निकाल देने को थोड़ा कहती हूँ। यह भी पड़ी रहेगी। लोग दूसरा ब्‍याह लड़के के लिए करते हैं, शौक के लिए नहीं करते। अगर इससे लड़का हो जाता तो हमारा क्‍या सिर फिरा हुआ था।"
रामनारायण - "अब जो प्रारब्‍ध ही में न हो तो क्‍या किया जाए?"
माँ - "इसीलिए तो कहती हूँ, दूसरा ब्‍याह कर लो। परमेश्‍वर कृपा करेगा।" यह बातचीत पार्वती ने सौर-गृह में लेटे-लेटे सुनी। वह पहले ही मर रही थी, यह बातचीत सुन कर और भी मर गई। उसे विश्‍वास हो गया कि अब यह ब्‍याह कभी न रुकेगा। आने वाले दिन आँखों तले फिर गए। सोचने लगी क्‍या होगा? अभी यह हाल है तो ब्‍याह के बाद क्‍या होगा? सभी दुतकारेंगे। सब नई बहू को पूछेंगे। मुझे कोई भी न पूछेगा। यह अनादर, यह अपमान, यह तिरस्‍कार कैसे सहूँगी? पार्वती ने अपने सिर पर जोर से थप्‍पड़ मारा और रो कर कहा - "परमात्‍मा! अब तो उठा लो। यह सहा नहीं जाता।"

हम रोते हैं इसलिए कि दूसरे हमें चुप कराएँ, इसलिए नहीं कि हमें और भी रुलाएँ। पार्वती इसी खयाल से रोई थी। लेकिन उसकी सास ने जब शब्‍द सुना तो वे और भी लाल-पीली हो गईं और उच्‍च स्‍वर में सुना कर बोलीं - "तेरे भाग में मौत नहीं, मौत तो हमारे भाग में है। बैठी राज करती है और छाती पर मूँग दलती है।"

यह शब्‍द नहीं थे, जहर में बुझे हुए तीर थे। पार्वती की आँखें अग्निमय हो गईं। उसकी सारी देह जलने लगी। रगों का रुधिर इस तरह खौलता था, जैसे कढ़ाई में तेल खौलता हो। सहसा रामनारायण अंदर आ गए और प्‍यार से बोले - "पार्वती। धीरज धरो। लड़के-लड़कियाँ दोनों बराबर हैं। माताजी जोश में आ कर जो जी में आता है, कह देती हैं। मगर उनकी नीयत खोटी नहीं। भोली हैं, इतना नहीं समझतीं कि जिनके यहाँ बेटे नहीं होते, वह मर थोड़ा ही जाती हैं। तुम ऐसी बातों की चिंता न किया करो, नहीं तो बीमार हो जाओगी।"

पार्वती चौंक पड़ी। उसे आश्‍चर्य था कि यह मीठे शब्‍द रामनारायण के मुँह से कैसे निकले? वह आज तक यही समझती थी कि यह बेटे का मुँह देखने को तरस रहे हैं। अभी-अभी माँ-बेटे में जो-जो बातें हो रही थीं, उनसे भी यही प्रकट होता था। एकाएक यह परिवर्तन क्‍यों? पार्वती ने बहुत सोचा, मगर कोई बात उसकी समझ में न आई। उसे आश्‍चर्य हुआ। पर इस आश्‍चर्य से बढ़ कर प्रसन्‍नता हुई। उसने कातर दृष्टि से अपने पति की तरफ देखा और आँखें बंद कर लीं। उसके सब पराए थे, केवल पति अपना था। मगर उसके लिए यही सब कुछ था।

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परंतु कुछ दिन के बाद पति भी अपना न रहा। रामनारायण ने दूसरा ब्‍याह कर लिया। पार्वती पर दुख का पहाड़ टूट पड़ा। उससे कोई सीधे मुँह बात भी न करता था, सब नई दुलहिन की सेवा में लगे रहते थे। अब नई दुलहिन घर की सब कुछ थी, पार्वती कुछ भी न थी। यहाँ तक कि उसका मान दासियों के बराबर भी न था। अब वह किसी काम में दखल न देती। चुपचाप अपनी कोठरी में पड़ी रहती। जो मिलता, खा लेती, जो हाथ आता पहन लेती। अब उसे किसी की कड़वी बात पर क्रोध न आता था, न जली-कटी बातें सुन कर आँखें सजल होती थीं। कभी जरा से कटु भाषण पर उसके शरीर में आग लग जाती थी। उस समय वह घर की रानी थी, मरग अब उसका सिंहासन छिन चुका था। अब उसके पति ने उसे अपने मन-मंदिर से निकाल दिया था। अब वह रानी नहीं थी, भिखारिन थी। भिखारिन को क्रोध करने का अधिकार किसने दिया है? परमात्‍मा ने भी नहीं। भिखारिन कुछ दिन मुफ्त की रोटियाँ फाड़ती रही, फिर काम करने लगी। पहले रानी से भिखारिन बनी थी, अब भिखारिन से दासी बनी।

उधर दयावती सारे घर पर शासन करती थी। वह हँसती थी, तो घर के सारे लोग हँसते थे। उदास होती, तो घर के लोग उदास हो जाते। जरा तेज चलती तो सास कहती, बेटी! सँभल कर चलो, नहीं पाँव दुखने लगेंगे। ऊपर से नीचे उतरती तो कहती, कमर दर्द करने लगेगी। उसका जरा-सा सिर दुखता तो रामनारायण की जान पर बन जाती। भागे-भागे डॉक्‍टर के पास जाते और दवाओं की शीशियाँ उठा लाते। ननदें दयावती पर प्राण देती थीं। क्‍या मजाल जो उसकी इच्‍छा के विरुद्ध एक शब्‍द भी मुँह से निकल जाए। परंतु इतना कुछ होने के पर भी दयावती खुश न थी। उसे दिल में हर समय बुरी-बुरी भावनाएँ उठा करतीं। एकांत में बैठती तो फूट-फूट कर रोया करती। उसे हँसते-मुस्‍कराते देख कर किसी को संदेह भी न हो सकता था कि उसके दिल में कोई प्राणघातक जलन, कोई दुखदायक पीड़ा होगी। ऊपर ठंडा पानी लहरें मारता था, नीचे आग सुलगती थी।

रात का समय था। पार्वती ने बर्तन साफ किए, रसोईघर धोया और छोटी लड़की को ले कर अपनी कोठरी में चली गई। मगर उसके शरीर का एक-एक अंग दर्द कर रहा था। दूसरे दिन जागी तो सारा शरीर तप रहा था और सिर उठाए न उठता था। पार्वती चुपचाप लेटी रही। उसमें हिलने की हिम्‍मत न थी, यहाँ तक कि नौ बज गए, और चूल्‍हा गरम न हुआ। लड़कियाँ रोटी माँगती थीं और रोती थीं। पार्वती उनकी तरफ देखती थी और कराहती थी। यह हृदय-विदारक दृश्‍य देख कर दयावती का दिल पसीज गया। वह दयावती थी, उसमें दया का अभाव न था। उसने मुँह से कुछ न कहा, परंतु रसोईघर में जा कर रसोई बनाने लगी।

इतने में पार्वती की सास ने पार्वती की कोठरी के बाहर आ कर कहा - "परमात्‍मा करे, ऐसी बहू किसी को न मिले। खाने को हर घड़ी तैयार है, काम का ध्‍यान ही नहीं। नई दुलहन बैठी काम करती है। यह रानी सेज पर लेटी है, कोई देखे तो क्‍या कहे?"

पार्वती ने कराह कर उत्‍तर दिया - "क्‍या करूँ? बुखार हो रहा है।"
सास - "यह सब बहाने मैं खूब जानती हूँ। बुखार-उखार कुछ नहीं है। बहाना है, बहाना।"
पार्वती - "माँजी! बहाना तो मैंने आज तक कभी नहीं किया।"
सास - "बड़ी सतवंती है न तू। बहाना क्‍यों करने लगी? कल साँझ तक बुखार न था। अब कैसे हो गया?"
पार्वती - "अब यह मैं क्‍या जानूँ? रात को देह दर्द करती थी।"
सास - "देखना! कहीं निमोनिया न हो जाए।"
पार्वती - "हो जाए तो क्‍या कहना! मगर निमोनिया भाग्‍यवानों को होता है। अभागों को वह भी नहीं होता।
सास - "भाग्‍यवान तो मैं ही हँ, अब मुझे मार। मुरदार गालियाँ देती है।"
पार्वती - "आप तो लड़ती हैं। मैंने यह कब कहा है?"
सास - "मेरा सिर फिरा हुआ है न?"
पार्वती - "शायद फिरा ही हो।"

आग पर तेल पड़ गया। सास ने गरज कर कहा - "अगर फिरा हुआ न होता तो तेरे जैसी कमजात लड़की को कैसे ब्‍याह लाती? परनाले का पत्‍थर चौबारे में लग गया।"

पार्वती कमजात का शब्‍द सुन कर क्रोध न रोक सकी। बोली - "जाओ! भीतर जा कर बको, मैं तो यों ही मर रही हूँ। इलाज का ध्‍यान नहीं, लड़ने की धुन सवार हो गई। परमात्‍मा ऐसी सास दुश्‍मन को भी न दे।"

अब सहन करना संभव न था। पार्वती की सास रोने लगी और इतने जोर से रोई कि सारा मुहल्‍ला जमा हो गया। चीख-चीख कर कहती थी - "बहनो! इस निर्लज्‍ज बहू ने मेरी पत उतार दी। मेरा जरा-सा लिहाज नहीं किया। रात को कहीं बुखार हो गया था। मैंने आ कर पूछा, हकीम को बुला हूँ। बस, इतनी-सी बात पर गालियाँ देने लगीं। बोली, तुम्‍हें मेरे बुखार की क्‍या परवाह है? तुम्‍हें उस समय मालूम होगा जब तुम्‍हारे बेटे को और उसकी बेगम को बुखार चढ़ेगा। तब पूछूँगी क्‍यों माँ! अब हकीम को बुलवाऊँ। मैंने कहा - मुझे गालियाँ दे लो, पर उस गऊ ने तुम्‍हारा क्‍या बिगाड़ा है? इस पर नाम ले ले कर रोने लगी, और मुझे कोसने लगी। वह गरीब न लेने में न देने में। अब तुम ही कहो, मैंने क्‍या बुरा किया?"

मुहल्‍ले की स्त्रियाँ चुप थीं। वह जानती थीं, पार्वती ऐसी स्‍त्री नहीं। परंतु उन्‍होंने मुँह से कुछ नहीं कहा। हम दुखिया के पक्ष में होते हुए भी उसकी सहायता नहीं करते। उलटा बाज वक्‍त उसके विरुद्ध बोल देते हैं। यही दशा स्त्रियों की थी। उनके दिल कहते थे, पार्वती निर्दोष है। सारा महाभारत बुढ़िया का मचाया हुआ है, मगर फिर भी उनमें सच बोलने का साहस न था। हम अपने लिए झूठ बोल सकते हैं पर दूसरों के लिए सच भी नहीं बोल सकते।

सारा दिन बीत गया, पार्वती को कोई दवा न मिली। न उसके पास जा कर किसी ने देखा कि गरीब जीती है, या मरती। रामनारायण खाना खाने आए और दुकान चले गए। सास धूप में लेटी रही। ननदें क्रोशिया लिए रूमाल बुनती रहीं। केवल पार्वती की अबोध लड़कियाँ थीं जो कभी उसके पास जा बैठती थीं, कभी बाहर निकल आती थीं। इनके अतिरिक्‍त एक और प्राणी भी था जो उसका सुख-दुख अनुभव करता था। और वह दयावती थी।

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हाँ, दयावती थी - पार्वती की सौत। वह पार्वती के लिए तड़पती थी, पार्वती के लिए रोती थी, मगर कुछ कर न सकती थी। वह इस घर में नई थी। उसे कोई कुछ कहता न था, वह स्‍वयं लज्‍जा से चुप रहती थी। उसे भय न मारता था, संकोच मारता। हमारा दिल सब से बड़ा दुश्‍मन है।

रात के दो बजे का समय था। पार्वती अपनी कोठरी में बेसुध पड़ी थी। एक ओर एक धुँधला-सा दीया टिमटिमा रहा था, मगर उसका तेल समाप्‍त हो चुका था और उसका प्रकाश धीरे-धीरे मर रहा था। यह मिट्टी का दीया न था, पार्वती के भाग्‍य का दीया था। कैसा तुच्‍छ, कितना छोटा! इसका प्रकाश अंधकार में किस तरह विलीन हो रहा था? इसका जीवन मृत्‍यु के मुँह में किस तरह भागता हुआ जा रहा था?

इतने में दरवाजा खुला और दयावती धीरे-धीरे अंदर आई। उसने पार्वती के चेहरे को देखा और ठंडी आह भर कर उसके सिरहाने बैठ गई। इसके बाद उसने पार्वती का सिर अपनी जंघा पर रख लिया और उसके बालों में प्‍यार से उँगलियाँ फेरने लगी।

पार्वती ने घबरा कर आँखें खोल दीं और कहा - "कौन?" उसको आशा थी, यह रामनारायण होंगे। दिन में माँ के खयाल से नहीं आए, अब आए हैं। अपना फिर भी अपना है, पराया कैसे हो जाएगा? मगर मुँह मोड़ कर देखा तो सन्‍नाटे में आ गई। यह रामनाराण न थे, दयावती थी। पार्वती की आँखों में पानी आ गया। उसने एक क्षण तक दयावती के मुँह की तरफ ताका और फिर उसके गले से लिपट गई। उसने जिन्‍हें अपना समझा था, वह पराए निकले। मगर जो पराया था, वह अपना बन गया। दुनिया के रास्‍ते कैसे निराले, कितने अद्भुत हैं।

दयावती ने पार्वती को चारपाई पर लिटा कर कहा - "कोई दवा नहीं खाई?"
पार्वती - "नहीं, मेरी परवाह किसे है, जो दवा खाऊँ?
दयावती - "तो बुखार कैसे उतरेगा?"
पार्वती - "भगवान उतार देगा।"
दयावती - "नहीं। तुम्‍हें दवा खानी होगी। इस घर के आदमी सभी राक्षस हैं। बहन! तुम्‍हें विश्‍वास न होगा, मैं तुम्‍हारे लिए सारा दिन कुढ़ती रही हूँ। तुम्‍हारे साथ सख्‍ती होती है, तो मेरा दिल रोने लगता है। जी चाहता है, तुम्‍हारे गले से लिपट जाऊँ, पर घरवालों का खयाल रास्‍ते में खड़ा हो जाता है। सोचती हूँ, क्‍या कहेंगे। सौ-सौ बातें बनाएँगे। मगर अब यह बेपरवाई न होगी।"

पार्वनी ने धुँधले दीए की तरफ देखते हुए कहा - "बहन! अब तो जी चाहता है, कुछ खा कर सो रहूँ। सब कुछ देख लिया और क्‍या देखूँगी? अब यह अधोगति नहीं सही जाती। अब तो मौत ही आ जाए।"

दयावती - "अधीर क्‍यों होती हो? यह दिन भी गुजर जाएँगे।"
पार्वती - "प्रारब्‍ध में यह लिखा है, यह मालूम न था। मालूम होता तो जोगिन बन जाती।"
दयावती - "जोगिन बनना इतना आसान होता तो आज संसार में चारों तरफ जोगिनें ही जोगिनें नजर आतीं।"
पार्वती - "आज का हाल तो तुमने स्‍वयं देख लिया होगा। बताओ, मेरा क्‍या दोष है?"
दयावती - "खूब देख लिया, ज्‍यादती सारी उनकी है। तुम्‍हारा दोष नहीं है, इसे सारा जहान जानता है।"
पार्वती - "कहने लगीं, गालियाँ देती है।"
दयावती - "अब लड़कियाँ होती हैं, तो इसमें तुम्‍हारा क्‍या दोष? यह कोई अपने बस की बात थोड़े ही है।"
पार्वती - "वह तो समझते हैं कि यह जान-बूझ कर लड़कियाँ जनती है।"
दयावती - "आदमी को कुछ तो समझना-सोचना भी चाहिए।"
पार्वती - "जब देखो, तने रहते हैं।"
दयावती - "और तुम्‍हारा कोई दोष नहीं।"
पार्वती - "जीना दूभर हो गया। हर समय सहमी रहती हूँ।"
दयावती - "पर मेरी तरफ से मन साफ कर लो। मैं तुम्‍हें बड़ी समझती हूँ।"
पार्वती - "मेरा मन तुमसे पहले ही साफ है।"
दयावती - "मेरे कारण तुम्‍हें जरा भी कष्‍ट न होगा।"

पार्वती ने दयावती को गले लगा लिया और स्‍नेहपूर्ण स्‍वर में कहा - "तूने मुझे बचा लिया। मैं समझती थी, इस घर में मेरे दुश्‍मन ही दुश्‍मन हैं, हितचिंतक कोई नहीं। परंतु तूने मेरा विचार बदल दिया। अब मुझे इतनी शांति है कि कम-से-कम मुझे तू तो बेगुनाह समझती है।"

सहासा दीया बुझ गया। चारों तरफ अंधकार फैल गया। इस अंधकार में पार्वती और दयावती दोनों छिप गईं। क्‍या उनके भाग्य का दीया भी बुझ गया?

*******************

पार्वती महीना भर बीमार रही। दयावती ने सेवा-सुश्रूषा में दिन-रात एक कर दिया। उसे हर समय वही चिंता रहती थी कि पार्वती किसी तरह बच जाए। वह उसके सिरहाने से न उठती। नियत समय पर दवा देती, समय पर दूध। रात को सोते-सोते चौंक उठती और उसे देखती कि सोती है या जागती है। ऐसी चिंता, ऐसी व्‍यग्रता, ऐसी उत्‍सुकता से किसी माँ ने अपने बच्‍चे का इलाज भी कम किया होगा। उसे सास समझाती थी, पति रोकता था, मगर वह किसी की न सुनती थी। कहती, इसकी सेवा मैं करूँगी। य‍ह दुखिया है। इसके मन-मंदिर में प्रेम की जोत जलती है। इसने मेरा मन मोह लिया है। पार्वती की लड़कियाँ दयावती की आवाज सुनतीं तो उनकी तबीयत हरी हो जाती और इस तरह लपक कर आतीं, जैसे वह उनकी माँ हो। उनके रहने-सहने का, खाने-पीने का सब प्रबंध वही करती थी। यह स्‍वर्गीय प्रेम, यह विशुद्ध, निर्मल, पवित्र दृश्‍य देख कर सारा मुहल्‍ला चकित था। ऐसी उदारता, ऐसी श्रद्धा, ऐसी प्रीति इस स्‍वार्थमय संसार में, इस द्वेषपूर्ण दुनिया में उन्‍होंने पहले न देखी थी। सौत को देख कर स्‍त्री के शरीर में आग लग जाती है, उसकी आँखों में क्रोध की चिनगारियाँ निकलने लगती हैं। यहाँ वही सौत सौत की सेवा करती थी। यह प्रेम कितना महान, कितना स्‍वच्‍छ था! इसमें आत्‍मसमर्पण था, विषय-वासना न थी, सेवा का शौक था, फल की इच्‍छा न थी। यह पति-पत्नी का प्रेम न था, दो महिलाओं का स्‍नेह था। यह दो सौतों का प्‍यार न था, दो सखियों की प्रीति थी।

धीरे-धीरे पार्वती की देह में ताकत आने लगी। दयावती ऐसी खुश थी, जैसे कोई राज्‍य जीत लिया हो। अब वह दो सखियाँ थीं, सारा दिन एक जगह बैठी रहीं और बातें करतीं। दयावती सोचती, यह दुखिया है, इससे अन्‍याय हो रहा है। पार्वती सोचती, मेरी सौत है तो क्‍या हुआ, पर इसका दिल प्रेम का सागर है। मुझे देख कर खुश हो जाती है। मेल ने दोनों को प्रेम-सूत्र में बाँध दिया। कुछ देर सखियाँ बनी रहीं, फिर बहनें बन गईं। पार्वती से सास का व्‍यवहार वैसे ही कठोर था, परंतु रामनारायण कभी-कभी हँस कर भी बोल लेते थे। और दयावती सबकी आँखों की पुतली थी।

इसी तरह एक वर्ष बीत गया। पार्वती कुछ महीनों के लिए मायके गई। लौटी तो दयावती की अवस्‍था ही और थी। न गालों पर वह मोहनी थी न आँखों में वह जादू। ऐसा मालूम होता था जैसे दयावती वह दयावती ही नहीं। पार्वती सोलह साल की सुकुमारी को छोड़ गई थी, अब उसे चालीस साल की बुढ़िया मिली। पार्वती पर वज्राघात हुआ। उसने दयावती का हाथ पकड़ा और उसे एकांत में ले गई। वहाँ जाते ही बोली - "यह तुझे क्या हो गया?"

दयावती - "हुआ तो कुछ भी नहीं।"
पार्वती - "पहचानी नहीं जाती। तेरी सूरत ही बदल गई।"
दयावती - "चल झूठी! मुझे छेड़ती है। तेरी आँखें बदल गई होंगी।"
पार्वती - "गालियाँ देती है। जबान भी बदल गई।"
दयावती - "अब तुमसे बातों की बाजी में तो मैं कभी न जीतूँगी।"
पार्वती - "अच्‍छा तो ठीक-ठीक बता दे, छिपाने से कुछ न होगा।"
दयावती - "तुम्‍हारे वहम का इलाज कौन करे?"
पार्वती - "सास से लड़ाई तो नहीं हो गई?"
दयावती - "बिलकुल नहीं। वह मुझे माँ से ज्‍यादा चाहती हैं।"
पार्वती - "उनसे झगड़ा हो गया है?"
दयावती - "वह ऐसे आदमी ही नहीं।"
पार्वती - "बीमार रही है क्‍या?"
दयावती - (हँस कर) "हाँ, बुखार चढ़ता रहा है।"
पार्वती - "तो मालूम हुआ, मुझसे छिपाती है। अब न पूछूँगी।"

दयावती रोने लगी। उसका ऐसा मालूम हुआ कि उसके शरीर को तोड़ कर प्राण-पंछी बाहर निकल जाएगा। सिसकियाँ भरते हुए बोली - "बहन! मुझे कोई रोग नहीं है। मुझसे किसी ने दुर्व्‍यवहार नहीं किया। मुझे चिंता रोग खा रहा है। मुझे भय हो रहा हैं कि यह आदर, प्‍यार, आनंद के दिन कुछ ही दिनों के मेहमान हैं। इस सावन की धूप पर कोई विश्‍वास नहीं। इसकी आयु बहुत थोड़ी है। आज मुझे सब सिर-आँखों पर बैठाते हैं लेकिन यह मान, यह सत्‍कार मेरे लिए नहीं, लड़के के लिए है। उनको लड़के की चाह ने दीवाना बना रखा है। सोचती हूँ अगर मेरे भी लड़की हो गई तो फिर क्‍या होगा? सबकी आँखें बदल जाएँगी। यह चिंता है जो मुझे अंदर-ही-अंदर खा रही है। मैं इस दुख से घुली जा रही हूँ और मुझे विश्‍वास हो गया है कि मेरे लड़की ही होगी और मैं न बचूँगी।"

यह कह कर दयावती रोने लगी। पार्वती के शरीर के रोंगटे खड़े हो गए। उसके मुँह से कुछ न निकला, एक शब्‍द भी नहीं, न हाँ, न ना। उसने दयावती का सिर खींच कर अपने गले से लगा लिया और रोने लगी। मगर उसका दिल कह रहा था - "अगर तू मरी तो मैं भी जीती न रहूँगी।"

आखिर वह दिन आ गया, जिसकी सबको प्रतीक्षा थी। रामनारायण ने दोनों बहनों को बुला भेजा था। एक दाई रखी, एक लेडी डॉक्‍टर। खाना बनाने के लिए एक स्‍त्री अलग थी। लेडी डॉक्‍टर ने कह दिया था लड़का होगा। रामनारायण ऐसे खुश थे जैसे किसी भिखारी को राज-सिंहासन मिल जाए, उछलते फिरते थे। उनके पाँव धरती पर न पड़ते थे। नौकरों से कहा - इनाम मिलेगा। मुहल्‍लेवालों से कहा, मिठाई बाँटेंगे। इष्‍ट मित्रों से भोजन देने की प्रतीक्षा की।

संध्‍या का समय था। रामनारायण के घर में स्त्रियाँ दौड़ती फिरती थीं। कानों पड़ी आवाज सुनाई न देती थी। लेड़ी डॉक्‍टर सख्‍ती के साथ हुक्‍म देती थी और लड़ती थी। मगर कोई बुरा न मानता था। कहीं गरम पानी पड़ा था, कहीं रूई के फाहे कतरे जा रहे थे। पार्वती उड़ी फिरती थी। दिल में प्रार्थना करती थी कि दयावती को लड़का हो, लड़की न हो। अगर लड़की हुई तो हम दोनों की मौत है। अब तो केवल मैं ही अभागिन हॅू, फिर दयावती को भी न पूछेगा। अभी उसकी खातिर कभी-कभी कोई मेरी भी सुध ले लेता है, फिर यह बात भी न रहेगी।

रामनारायण दरवाजे में बैठे माला फेरते थे और प्रार्थना करते थे‍ कि प्रभु! यह नैया पार लगा दे। कभी-कभी यह विचार आता था कि पार्वती से अन्‍याय हुआ है। लड़का हो जाए तो उसके साथ जरा सख्‍ती न करूँ। ऐसी एकाग्रता, ऐसी लगन, ऐसी श्रद्धा से उन्‍होंने कभी प्रार्थना न की थी। संकट हमें परमात्‍मा का भक्‍त बना देता है। वैभव में परमात्‍मा का कभी ध्‍यान ही नहीं आता। एकाएक अंदर से कुछ आवाजें आईं। रामनारायण ने माला के मनके जोर-जोर से फेरने शुरू कर दिए। घबराए हुए कहते थे, परमात्‍मा! कृपा करो। तुम्‍हारे बिना और किसी का सहारा नहीं। इतने में रामनारायण की माँ आ कर दरवाजे पर खड़ी हो गई। रामनारायण ने कहा - "क्‍या हुआ?"

माँ ने धीरे से जवाब दिया - "लड़की।"

रामनारायण की उठती हुई उमंगें बैठ गईं। जैसे कबूतर उड़ना चाहता है और बाज को ऊपर मँडराते देख कर फिर वहीं बैठ जाता है। उन्‍होंने माला धरती पर पटक दी और निराशा से इधर-उधर टहलने लगे। किसी सेठ को अपना सर्वस्‍व लुट जाने पर इतना दुख न होता।

थोड़ी देर बाद दयावती के पास लेडी डॉक्‍टर और पार्वती के सिवा कोई भी न था। सब रामनारायण के गिर्द जमा थे। कोई शोक प्रकट करता था, कोई सांत्‍वना देता था। मगर रामनारायण बिल्‍कुल चुप थे। चारों तरफ देखते थे और ठंडी साँसें भरते थे। दयावती का किसी को भी खयाल न था।

सहसा पार्वती कमरे में आई और बोली - "दयावती मर गई।"

रामनारायण बैठे थे, "नवजात लड़की की भी कोई आशा नहीं।"

सारे घर में कुहराम मच गया। रामनारायण, उनकी माँ, उनकी बहनें सब रोने लगीं। उनके आर्तनाद से दुश्‍मनों के कलेजे भी छलनी होते थे। इस तरह रोती थीं जैसे उनका लड़का मर गया है। केवल पार्वती की आँख में पानी न था। वह कहती थी, कैसे छलिए हैं। दिल में दया नहीं, आँख में आँसू हैं। परमात्‍मा करे, ऐस धोखेबाजों के यहाँ कभी संतान न हो।

दूसरे दिन दयावती और उसकी लड़की दोनों की अर्थी उठी। घर के सब लोग साथ थे, केवल पार्वती न थी। उसे रात ही बुखार हो गया था। रामनारायण ने लड़कियों को उसके पास छोड़ा और स्‍वयं अर्थी के साथ चले गए।

दाह-कार्य करके लौटे तो घर में पार्वती की लाश पड़ी थी। और उसके पास उसकी अबोध कन्‍याएँ बैठी फूट-फूट कर रो रही थीं। उसने दयावती से कहा था, एकसाथ जिएँगी, एकसाथ मरेंगी। उसका वचन झूठा न निकला। वह दाह-कर्म के समय पछड़ गई थी, परंतु परलोक यात्रा में पीछे न रही। दोनों विपदाग्रस्‍त स्त्रियाँ एक ही दिन दुनिया से रवाना हुईं।

सुदर्शन


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Sudarshan - Andhkaar | सुदर्शन - अंधकार | Story

हिन्दी के प्रसिद्ध लेखक सुदर्शन जी की यह कहानी पुत्र लोभ की आकांक्षा लिए हुए एक ऐसे परिवार की है जहाँ स्त्रियों का सम्मान इस बात पर निर्भर है की वह पुत्र आकांक्षा को पूर्ण कर पाती है या नहीं। यह कहानी आपके मन को झंझोर कर रख देती है।


लाला रामनारायण अमृतसर के प्रसिद्ध व्‍यापारी थे, मिट्टी को भी हाथ लगाते तो सोना हो जाता। उन पर लक्ष्‍मी की विशेष कृपा थी - उनकी दो दुकानें थीं, एक कपड़े की, दूसरी अंग्रेजी दवाइयों की। उन्‍हें दोनों से मुनाफा होता था। किसी वस्‍तु का टोटा न था। भगवान ने सब कुछ दिया था, मगर कुछ भी न था। उनके लड़कियाँ कई थीं, लड़का एक भी न था। यह पुत्र अभाव उन्‍हें खाए जाता था, हर समय उदास रहते थे। बाहर जा कर तो कदाचित हँस-बोल भी लेते, पर घर में आते ही उनकी आँखें अग्निमय हो जाती थीं।
पार्वती समझती थी, इसमें मेरा कोई दोष नहीं। अब लड़के-लड़कियाँ पैदा करना किसी के अपने बस की बात थोड़े ही है? परंतु इस पर भी उसमें इतना साहस न था कि पति के सामने मुस्‍कराते हुए खड़ी हो जाए। वह घर में आते थे तो थर-थर काँपती रहती कि कहीं गरज न उठें। सोचती, मेरे ही भाग्‍य में आग लगी है, इसमें किसी का दोष नहीं। लोगों के यहाँ कई-कई लड़के पैदा होते हैं, पत्‍थरों के लिए मैं ही रह गई हूँ। सास कहती, मेरे मोती जैसे बेटे को अभागिन मिल गई। चेहरा कैसा दमकता था, जैसे अनार का लाल दाना हो। पर अब वह बात ही नहीं। न होंठों पर वह मुस्‍कान है, न आँखों में वह ज्‍योति। देह पहले से आधी भी नहीं रही। अंदर-ही-अंदर घुला जाता है। रामनारायण यह बातें सुनते तो और भी दुखी हो जाते। कहते - "माँ! तुम ऐसी बातें न किया करो। जो वस्‍तु भाग्‍य में न लिखी हो, उसके लिए रोना निष्‍फल है। मैंने समझ लिया है, हमारे वंश का नाम-निशान मिट के रहेगा, हमारे भाग्‍य में पुत्र-सुख नहीं लिखा। तुम कुढ़ती हो, मुझे रोना आता है।"

पार्वती यह बातें सुनती तो उसके दिल में तीर चुभ जाते। पहरों रोती और प्रारब्‍ध को गालियाँ देती रहती। वह भागवान घर में आई थी, पर अभागिन बन कर, जैसे खीर के थाल में लाल मर्च पड़ जाए। उसे और सारे सुख थे, एक यही न था। उसने इलाज किया, साधु - संतों से भस्‍म की चुटकी ली, व्रत रखे मगर भाग्‍यरेखा न बदली। यहाँ तक कि कई वर्ष बीत गए, परंतु पार्वती का आशा अंक पुत्र-मणि से न भरा। लड़कियाँ चार थीं, लड़का एक भी न था।


*******************

एक दिन गली में एक ज्‍योतिषी आया। बच्‍चों के लिए रीछ और स्त्रियों के लिए ज्‍योतिषी दोनों समान हैं। स्त्रियों को तमाशा हाथ लग गया। बढ़-चढ़ कर हाथ दिखाने लगीं। ज्‍योतिषी बातें बनाता था, पैसे बटोरता था। कैसा अच्‍छा व्‍यापार है! किसी का माल नहीं बिकता, किसी की बातें बिकती हैं। स्त्रियाँ पैसे देती थीं और हँसती थीं। मगर पार्वती घर बैठी अपने दुर्भाग्‍य को रो रही थी।

इतने में उसकी सास ने कहा - "पार्वती! जरा इधर आ कर तू भी पंडितजी को हाथ दिखा ले।"
पार्वती ने नैराश्‍य भाव से उत्‍तर दिया - "हाथ दिखाने से क्‍या होगा?"
"मगर हर्ज ही क्‍या है? दिखा ले।"

पार्वती का जी न चाहता था कि हाथ दिखाए, परंतु सास के भय से उसने उठ कर हाथ ज्‍योतिषी के सामने कर दिया। सब स्त्रियाँ चुपचाप खड़ी हो गईं। यह हस्‍त-निरीक्षण न था, भाग्‍य-निरीक्षण था। ज्‍योतिषी ने हाथ की रेखाओं को देखा और कहा - "तुम्‍हारे मन में हमेशा क्‍लेश रहता है।"

पार्वती की सास ने सिर हिला कर कहा - "ठीक है पंडितजी।"
ज्‍योतिषी - "पर यह क्‍लेश मन का है, शरीर का नहीं।
सास - "यह भी सच है।"
ज्‍योतिषी - "इसके कन्‍याएँ होती हैं, लड़का नहीं होता।"
स्त्रियों ने कहा - "देखा! यह विद्या की बातें हैं। जो चार अच्‍छर पढ़ जाते हैं, वह कहते हैं, जोतस-सासतर सब झूठ हैं। अब कहो, सच बताया या नहीं?"
ज्‍योतिषी - "इसका पति भी बहुत दुखी रहता है।"
सास - "महाराज, यह भी सच है।"
ज्‍योतिषी - "इसके लिए नच्‍छत्‍तर तो सब अच्‍छे हैं, केवल एक नच्‍छतर अशुभ है। यह सब उसका फल है।"
सास - "महाराज तो अंतरजामी हैं। अब यह देखें इसके भाग में बेटा है या नहीं।"
ज्‍योतिषी ने अच्‍छी तरह देख कर उँगलियों पर हिसाब किया और इसके बाद शोक से सिर हिला कर कहा - "नहीं।"

उत्‍तर साधारण था, पर पार्वती का दिल दहल गया। उसकी देह से पसीना छूटने लगा, जैसे जीवन की सकल आशाएँ और उमंगें प्रस्‍थान कर गई हों। उसने हतभागों की तरह भूमि की ओर देखा और रुक-रुक कर पूछा - "इसका कुछ उपाय भी है, या नहीं?"

ज्‍योतिषी - "उपाय तो है, परंतु बड़ा कठिन है।"
पार्वती - "मैं सब कुछ कर लूँगी।"
ज्‍योतिषी - "रात को श्‍मशान में बैठ कर जाप करना होगा। कर सकोगी?"

पार्वती का चेहरा फीका पड़ गया। आशा सामने आई थी, ओझल हो गई। पार्वती फिर उदास हो गई, जैसे कोई बाजी जीतते-जीतते हार गई।

ज्‍योतिषी - "तुम उदास न हो। तुम्‍हारी खातिर यह काम मैं कर दूँगा। भय बहुत है, सिद्धि के समय भूत सामने आ कर खड़े हो जाते हैं। अनजान आदमी सहम कर मर जाए। परंतु भूत हमारा क्‍या बिगाड़ लेंगे, चाहें तो पल-भर में भस्‍म कर दें। हमारे शब्‍दों में आग है। एक मंत्र पढ़ें तो चिल्‍ला कर भाग निकलें।"

पार्वती की आँखें आशापूर्ण हो गईं, जैसे देवी का वरदान मिल गया हो। सास का चेहरा आशा की आभा से लाल था। उसे विश्‍वास हो गया कि अब जरूर लड़का होगा। करामाती पंडित रेख में मेख मार सकता है। ज्‍योतिषी जी की खातिर होने लगी। उसने जो कुछ माँगा वही दिया। पार्वती और उसकी सास न नहीं करती थीं। कभी काले बकरे के लिए रुपए माँगता, कभी सोने-चाँदी के लिए। उसे आज तक न ऐसा अमीर घर मिला था, न ऐसे अंधे श्रद्धालु। दोनों हाथों से लूटता था। और वह लुटवाते थे। हर मंगलवार को गरीबों में रोटियाँ बाँटी जाती थीं। ज्‍योतिषी जी ने पार्वती को एक मंत्र सिखा दिया था। वह नहा कर पंद्रह मिनट जाप करती थी। खाना भूल सकता था, मगर इस मंत्र का जाप न भूल सकता था। अब इस मंत्र ही पर जीवन की सारी अभिलाषाएँ अवलंबित थीं। सदा शंका लगी रहती कहीं यह कच्‍चा तागा टूट न जाए। वह इसे प्राणपण से बचा कर रखती थी, यहाँ तक कि मंत्र की परीक्षा का दिन समीप आ गया। अब कुछ दिन बाकी थे।

*******************

पार्वती की रात-दिन खातिरदारियाँ होने लगीं। घर के लोग उसे कोई काम न करने देते थे, कहते आराम से बैठी रहो, सब कुछ हो जाएगा। लाला रामनारायण ने कभी उससे सीधे मुँह बात न की थी। अब हँस-हँस कर बोलने लगे, जैसे उससे मन-मुटाव था ही नहीं। मुँह हर समय खिला रहता। पार्वती को कभी ताँगे की सैर कराने ले जाते, कभी थियेटर दिखाने। कहते, जो जी में आए माँग लिया करो, मन मान कर रह जाना स्‍वास्‍थ्‍य को खराब कर देता है। पार्वती को यह नौ महीने गुजरते मालूम न हुए। संसार के सारे सुख, सारे आराम पर्याप्‍त थे। जो कहती, वही हो जाता। किसी को दम मारने की मजाल न थी। पहले दासी थी अब रानी बनी। सास, जो दिन-रात हृदय-बेधी ताने मारती थी, अब ऊँची आवाज से बोलते हुए भी डरती थी। कहीं पार्वती क्रोध न कर बैठे, कहीं उसका जी न खराब हो जाए। पार्वती की ऐसी खातिर, ऐसी खुशामद कभी न हुई।

एक दिन रामनारायण बोले - "ज्‍योतिषी कहता है, सौ रुपए से एक भी पैसा कम न लूँगा।"
पार्वती - "वह समय तो आ ले, देखा जाएगा।"
रामनारायण - "मेरा दिल कहता है, अब के लड़का ही होगा।"
पार्वती - "लच्‍छन तो मुझे भी अच्‍छे मालूम होते हैं। दिल में ऐसे-ऐसे विचार आते हैं कि तुमसे क्‍या कहूँ?"
रामनाराण - "बस, ठीक है। लड़का ही होगा।"
पार्वती - "जी चाहता है, फल और मिठाइयाँ ही खाती रहूँ। रोटी की तरफ देखने से भी घृणा होती है।"
रामनारायण - "खटाई पर तो दिल नहीं दौड़ता?"
पार्वती - "कभी खयाल भी नहीं आता।"
रामनारायण - "जी कैसा रहता है?"
पार्वती - "बहुत प्रसन्‍न। पहले सदा उदासी छाई रहती थी। अब सुस्‍ती नाम को नहीं। जी चाहता है, सारा दिन सैर किया करूँ। ऐसी दशा मेरी आज तक कभी न हुई थी।"
रामनाराण - "मेरा दिल भी यही कहता है कि अब की जरूर लड़का ही होगा।"
पार्वती - (हँस कर) "अगर लड़का हुआ तो मुझे क्‍या दोगे?"
रामनारायण - "जो माँगोगी, वही दँगा। तुमसे बाहर थोड़े हूँ।"
पार्वती - "हीरे का हार मँगवा दोगे?"
रामनारायण - "अरे! हीरे का हार?"
पार्वती - "बस, बस! इतना ही देखना था देख लिया।"
रामनारायण - "तुम तो वकीलों की तरह जिरह करती हों।"
पार्वती - "चलो रहने दो। मैं तुम्‍हारा दिल देखती थी। मुझे हार की क्‍या पड़ी है? तुम्‍हारी खुशी मिल जाए, यही सब कुछ है।"
रामनारायण - "मैं तुमसे कभी नाराज नहीं हुआ।"
पार्वती - "क्‍यों झूठ बोलते हो? तुम्‍हारी तो आँखें ही बदल गई थीं। मैं अनपढ़ हूँ, पर अंधी नहीं हूँ। आँखें पहचानती हूँ।"
रामनारायण - "तुम्‍हें धोखा हुआ होगा।"
पार्वती - "खैर! यह भी देखा जाएगा।"

इसी तरह नौ महीने बीत गए। प्रसव-काल आ पहुँचा। रामनारायण बाहर बैठे घबराते थे, उनकी माँ अंदर घबराती थीं। ज्‍यों-ज्‍यों समय गुजरता जाता था, उसकी उत्‍सुकता बढ़ती जाती थी। देखें क्‍या हो, क्‍या न हो? चेहरे का रंग क्षण-क्षण में बदल रहा था। कभी आशा, कभी निराशा, कभी व्‍याकुलता। उनकी सकल इच्‍छाएँ, समस्‍त उल्‍लास, सारे उद्गार आँखों में आ बैठे थे। उनके जीवन का आधार अब केवल एक शब्‍द पर था। यह खेती एक छींटे की प्‍यासी थी। यह लता एक झोंके की भूखी थी।

सहसा अंदर से नवजात बालक के रोने की आवाज आई। रामनारायण चौंक कर खड़े हो गए और सवेग अंदर को चले। वे अभी आँगन ही में पहुँचे थे कि माँ बाहर निकल आई। इस समय उसकी आँखों में आँसू थे, मुँह पर क्रोध, जैसे अग्नि की ज्‍वाला में पानी की बूँदें जल रही हों। रामनाराण के पाँव वहीं रुक गए। अब उनमें आगे बढ़ने की शक्ति न थी। यह लंबा सफर, यह सुदूर यात्रा कितनी आशाओं को ले कर तय की थी। सब निराशा की भेंट हो गई। हृदय क्षेत्र को पानी का छींटा न मिला। आशालता को वायु का झोंका प्राप्‍त न हुआ।

*******************

फिर लड़की। रामनारायण का सिर चकराने लगा। निराशा जब चरम-सीमा पर पहुँच जाती है तो हमारी जीभ बंद हो जाती है। रामनारायण भी चुप हो गए। बहुत देर के बाद बोले - "अब तो जी चाहता है, कहीं निकल जाऊँ, यहाँ मेरे दिल को शांति न मिलेगी।"

माँ - "धीरज धरो। घबराने से क्‍या होता है?"
रामनारायण - "वह ज्‍योतिषी मिल जाए तो मुँह नोच लूँ। मुझे तो उस पर पहले ही विश्‍वास न था, मगर तुम्‍हारे खयाल से चुप रहा। हजारों पर पानी फिर गया।"
माँ - "मुझे क्‍या पता था, धोखा ही धोखा है।"
रामनारायण - "कहता था, जाप करूँगा तो लड़का हो जाएगा। सब वाहियात ढकोसले हैं। ऐसे महात्‍मा होते तो माँगते क्‍यों फिरते? घर बैठे पाँव पुजवाते।"
माँ - "बेटा! जब अपने ही कर्मों में न हो तो कोई क्या करे? आदमी तो बुरा न था। जो-जो बात थी, खोल कर कह दी। सारा मुहल्‍ला वाह-वाह करता था। एक यह बात झूठ निकली। बाकी सब सच निकला।"
रामनारायण - "हमारे भाग ही खोटे हैं। अब मुझे आज्ञा दो, साधु हो कर कहीं निकल जाऊँ। घर में रहा तो पागल हो जाऊँगा।"
माँ - "कैसी बातें मुँह से निकालते हो तुम? भाग तुम्‍हारे क्‍यों खोटे होने लगे? भाग उस अभागिनी के खोटे हैं, जिसे राज-सिंहासन पर बैठ कर भी आराम न मिला। मेरी मानो तो अब दूसरा ब्‍याह कर लो, इससे लड़का न होगा। बहुत बरदाश्‍त किया, अब नहीं सहा जाता।"
रामनारायण - "मैं मर जाऊँगा, पर यह न करूँगा। मैं आदमी हूँ, राक्षस नहीं हूँ।"
माँ - "अरे! मैं उसे घर से निकाल देने को थोड़ा कहती हूँ। यह भी पड़ी रहेगी। लोग दूसरा ब्‍याह लड़के के लिए करते हैं, शौक के लिए नहीं करते। अगर इससे लड़का हो जाता तो हमारा क्‍या सिर फिरा हुआ था।"
रामनारायण - "अब जो प्रारब्‍ध ही में न हो तो क्‍या किया जाए?"
माँ - "इसीलिए तो कहती हूँ, दूसरा ब्‍याह कर लो। परमेश्‍वर कृपा करेगा।" यह बातचीत पार्वती ने सौर-गृह में लेटे-लेटे सुनी। वह पहले ही मर रही थी, यह बातचीत सुन कर और भी मर गई। उसे विश्‍वास हो गया कि अब यह ब्‍याह कभी न रुकेगा। आने वाले दिन आँखों तले फिर गए। सोचने लगी क्‍या होगा? अभी यह हाल है तो ब्‍याह के बाद क्‍या होगा? सभी दुतकारेंगे। सब नई बहू को पूछेंगे। मुझे कोई भी न पूछेगा। यह अनादर, यह अपमान, यह तिरस्‍कार कैसे सहूँगी? पार्वती ने अपने सिर पर जोर से थप्‍पड़ मारा और रो कर कहा - "परमात्‍मा! अब तो उठा लो। यह सहा नहीं जाता।"

हम रोते हैं इसलिए कि दूसरे हमें चुप कराएँ, इसलिए नहीं कि हमें और भी रुलाएँ। पार्वती इसी खयाल से रोई थी। लेकिन उसकी सास ने जब शब्‍द सुना तो वे और भी लाल-पीली हो गईं और उच्‍च स्‍वर में सुना कर बोलीं - "तेरे भाग में मौत नहीं, मौत तो हमारे भाग में है। बैठी राज करती है और छाती पर मूँग दलती है।"

यह शब्‍द नहीं थे, जहर में बुझे हुए तीर थे। पार्वती की आँखें अग्निमय हो गईं। उसकी सारी देह जलने लगी। रगों का रुधिर इस तरह खौलता था, जैसे कढ़ाई में तेल खौलता हो। सहसा रामनारायण अंदर आ गए और प्‍यार से बोले - "पार्वती। धीरज धरो। लड़के-लड़कियाँ दोनों बराबर हैं। माताजी जोश में आ कर जो जी में आता है, कह देती हैं। मगर उनकी नीयत खोटी नहीं। भोली हैं, इतना नहीं समझतीं कि जिनके यहाँ बेटे नहीं होते, वह मर थोड़ा ही जाती हैं। तुम ऐसी बातों की चिंता न किया करो, नहीं तो बीमार हो जाओगी।"

पार्वती चौंक पड़ी। उसे आश्‍चर्य था कि यह मीठे शब्‍द रामनारायण के मुँह से कैसे निकले? वह आज तक यही समझती थी कि यह बेटे का मुँह देखने को तरस रहे हैं। अभी-अभी माँ-बेटे में जो-जो बातें हो रही थीं, उनसे भी यही प्रकट होता था। एकाएक यह परिवर्तन क्‍यों? पार्वती ने बहुत सोचा, मगर कोई बात उसकी समझ में न आई। उसे आश्‍चर्य हुआ। पर इस आश्‍चर्य से बढ़ कर प्रसन्‍नता हुई। उसने कातर दृष्टि से अपने पति की तरफ देखा और आँखें बंद कर लीं। उसके सब पराए थे, केवल पति अपना था। मगर उसके लिए यही सब कुछ था।

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परंतु कुछ दिन के बाद पति भी अपना न रहा। रामनारायण ने दूसरा ब्‍याह कर लिया। पार्वती पर दुख का पहाड़ टूट पड़ा। उससे कोई सीधे मुँह बात भी न करता था, सब नई दुलहिन की सेवा में लगे रहते थे। अब नई दुलहिन घर की सब कुछ थी, पार्वती कुछ भी न थी। यहाँ तक कि उसका मान दासियों के बराबर भी न था। अब वह किसी काम में दखल न देती। चुपचाप अपनी कोठरी में पड़ी रहती। जो मिलता, खा लेती, जो हाथ आता पहन लेती। अब उसे किसी की कड़वी बात पर क्रोध न आता था, न जली-कटी बातें सुन कर आँखें सजल होती थीं। कभी जरा से कटु भाषण पर उसके शरीर में आग लग जाती थी। उस समय वह घर की रानी थी, मरग अब उसका सिंहासन छिन चुका था। अब उसके पति ने उसे अपने मन-मंदिर से निकाल दिया था। अब वह रानी नहीं थी, भिखारिन थी। भिखारिन को क्रोध करने का अधिकार किसने दिया है? परमात्‍मा ने भी नहीं। भिखारिन कुछ दिन मुफ्त की रोटियाँ फाड़ती रही, फिर काम करने लगी। पहले रानी से भिखारिन बनी थी, अब भिखारिन से दासी बनी।

उधर दयावती सारे घर पर शासन करती थी। वह हँसती थी, तो घर के सारे लोग हँसते थे। उदास होती, तो घर के लोग उदास हो जाते। जरा तेज चलती तो सास कहती, बेटी! सँभल कर चलो, नहीं पाँव दुखने लगेंगे। ऊपर से नीचे उतरती तो कहती, कमर दर्द करने लगेगी। उसका जरा-सा सिर दुखता तो रामनारायण की जान पर बन जाती। भागे-भागे डॉक्‍टर के पास जाते और दवाओं की शीशियाँ उठा लाते। ननदें दयावती पर प्राण देती थीं। क्‍या मजाल जो उसकी इच्‍छा के विरुद्ध एक शब्‍द भी मुँह से निकल जाए। परंतु इतना कुछ होने के पर भी दयावती खुश न थी। उसे दिल में हर समय बुरी-बुरी भावनाएँ उठा करतीं। एकांत में बैठती तो फूट-फूट कर रोया करती। उसे हँसते-मुस्‍कराते देख कर किसी को संदेह भी न हो सकता था कि उसके दिल में कोई प्राणघातक जलन, कोई दुखदायक पीड़ा होगी। ऊपर ठंडा पानी लहरें मारता था, नीचे आग सुलगती थी।

रात का समय था। पार्वती ने बर्तन साफ किए, रसोईघर धोया और छोटी लड़की को ले कर अपनी कोठरी में चली गई। मगर उसके शरीर का एक-एक अंग दर्द कर रहा था। दूसरे दिन जागी तो सारा शरीर तप रहा था और सिर उठाए न उठता था। पार्वती चुपचाप लेटी रही। उसमें हिलने की हिम्‍मत न थी, यहाँ तक कि नौ बज गए, और चूल्‍हा गरम न हुआ। लड़कियाँ रोटी माँगती थीं और रोती थीं। पार्वती उनकी तरफ देखती थी और कराहती थी। यह हृदय-विदारक दृश्‍य देख कर दयावती का दिल पसीज गया। वह दयावती थी, उसमें दया का अभाव न था। उसने मुँह से कुछ न कहा, परंतु रसोईघर में जा कर रसोई बनाने लगी।

इतने में पार्वती की सास ने पार्वती की कोठरी के बाहर आ कर कहा - "परमात्‍मा करे, ऐसी बहू किसी को न मिले। खाने को हर घड़ी तैयार है, काम का ध्‍यान ही नहीं। नई दुलहन बैठी काम करती है। यह रानी सेज पर लेटी है, कोई देखे तो क्‍या कहे?"

पार्वती ने कराह कर उत्‍तर दिया - "क्‍या करूँ? बुखार हो रहा है।"
सास - "यह सब बहाने मैं खूब जानती हूँ। बुखार-उखार कुछ नहीं है। बहाना है, बहाना।"
पार्वती - "माँजी! बहाना तो मैंने आज तक कभी नहीं किया।"
सास - "बड़ी सतवंती है न तू। बहाना क्‍यों करने लगी? कल साँझ तक बुखार न था। अब कैसे हो गया?"
पार्वती - "अब यह मैं क्‍या जानूँ? रात को देह दर्द करती थी।"
सास - "देखना! कहीं निमोनिया न हो जाए।"
पार्वती - "हो जाए तो क्‍या कहना! मगर निमोनिया भाग्‍यवानों को होता है। अभागों को वह भी नहीं होता।
सास - "भाग्‍यवान तो मैं ही हँ, अब मुझे मार। मुरदार गालियाँ देती है।"
पार्वती - "आप तो लड़ती हैं। मैंने यह कब कहा है?"
सास - "मेरा सिर फिरा हुआ है न?"
पार्वती - "शायद फिरा ही हो।"

आग पर तेल पड़ गया। सास ने गरज कर कहा - "अगर फिरा हुआ न होता तो तेरे जैसी कमजात लड़की को कैसे ब्‍याह लाती? परनाले का पत्‍थर चौबारे में लग गया।"

पार्वती कमजात का शब्‍द सुन कर क्रोध न रोक सकी। बोली - "जाओ! भीतर जा कर बको, मैं तो यों ही मर रही हूँ। इलाज का ध्‍यान नहीं, लड़ने की धुन सवार हो गई। परमात्‍मा ऐसी सास दुश्‍मन को भी न दे।"

अब सहन करना संभव न था। पार्वती की सास रोने लगी और इतने जोर से रोई कि सारा मुहल्‍ला जमा हो गया। चीख-चीख कर कहती थी - "बहनो! इस निर्लज्‍ज बहू ने मेरी पत उतार दी। मेरा जरा-सा लिहाज नहीं किया। रात को कहीं बुखार हो गया था। मैंने आ कर पूछा, हकीम को बुला हूँ। बस, इतनी-सी बात पर गालियाँ देने लगीं। बोली, तुम्‍हें मेरे बुखार की क्‍या परवाह है? तुम्‍हें उस समय मालूम होगा जब तुम्‍हारे बेटे को और उसकी बेगम को बुखार चढ़ेगा। तब पूछूँगी क्‍यों माँ! अब हकीम को बुलवाऊँ। मैंने कहा - मुझे गालियाँ दे लो, पर उस गऊ ने तुम्‍हारा क्‍या बिगाड़ा है? इस पर नाम ले ले कर रोने लगी, और मुझे कोसने लगी। वह गरीब न लेने में न देने में। अब तुम ही कहो, मैंने क्‍या बुरा किया?"

मुहल्‍ले की स्त्रियाँ चुप थीं। वह जानती थीं, पार्वती ऐसी स्‍त्री नहीं। परंतु उन्‍होंने मुँह से कुछ नहीं कहा। हम दुखिया के पक्ष में होते हुए भी उसकी सहायता नहीं करते। उलटा बाज वक्‍त उसके विरुद्ध बोल देते हैं। यही दशा स्त्रियों की थी। उनके दिल कहते थे, पार्वती निर्दोष है। सारा महाभारत बुढ़िया का मचाया हुआ है, मगर फिर भी उनमें सच बोलने का साहस न था। हम अपने लिए झूठ बोल सकते हैं पर दूसरों के लिए सच भी नहीं बोल सकते।

सारा दिन बीत गया, पार्वती को कोई दवा न मिली। न उसके पास जा कर किसी ने देखा कि गरीब जीती है, या मरती। रामनारायण खाना खाने आए और दुकान चले गए। सास धूप में लेटी रही। ननदें क्रोशिया लिए रूमाल बुनती रहीं। केवल पार्वती की अबोध लड़कियाँ थीं जो कभी उसके पास जा बैठती थीं, कभी बाहर निकल आती थीं। इनके अतिरिक्‍त एक और प्राणी भी था जो उसका सुख-दुख अनुभव करता था। और वह दयावती थी।

*******************

हाँ, दयावती थी - पार्वती की सौत। वह पार्वती के लिए तड़पती थी, पार्वती के लिए रोती थी, मगर कुछ कर न सकती थी। वह इस घर में नई थी। उसे कोई कुछ कहता न था, वह स्‍वयं लज्‍जा से चुप रहती थी। उसे भय न मारता था, संकोच मारता। हमारा दिल सब से बड़ा दुश्‍मन है।

रात के दो बजे का समय था। पार्वती अपनी कोठरी में बेसुध पड़ी थी। एक ओर एक धुँधला-सा दीया टिमटिमा रहा था, मगर उसका तेल समाप्‍त हो चुका था और उसका प्रकाश धीरे-धीरे मर रहा था। यह मिट्टी का दीया न था, पार्वती के भाग्‍य का दीया था। कैसा तुच्‍छ, कितना छोटा! इसका प्रकाश अंधकार में किस तरह विलीन हो रहा था? इसका जीवन मृत्‍यु के मुँह में किस तरह भागता हुआ जा रहा था?

इतने में दरवाजा खुला और दयावती धीरे-धीरे अंदर आई। उसने पार्वती के चेहरे को देखा और ठंडी आह भर कर उसके सिरहाने बैठ गई। इसके बाद उसने पार्वती का सिर अपनी जंघा पर रख लिया और उसके बालों में प्‍यार से उँगलियाँ फेरने लगी।

पार्वती ने घबरा कर आँखें खोल दीं और कहा - "कौन?" उसको आशा थी, यह रामनारायण होंगे। दिन में माँ के खयाल से नहीं आए, अब आए हैं। अपना फिर भी अपना है, पराया कैसे हो जाएगा? मगर मुँह मोड़ कर देखा तो सन्‍नाटे में आ गई। यह रामनाराण न थे, दयावती थी। पार्वती की आँखों में पानी आ गया। उसने एक क्षण तक दयावती के मुँह की तरफ ताका और फिर उसके गले से लिपट गई। उसने जिन्‍हें अपना समझा था, वह पराए निकले। मगर जो पराया था, वह अपना बन गया। दुनिया के रास्‍ते कैसे निराले, कितने अद्भुत हैं।

दयावती ने पार्वती को चारपाई पर लिटा कर कहा - "कोई दवा नहीं खाई?"
पार्वती - "नहीं, मेरी परवाह किसे है, जो दवा खाऊँ?
दयावती - "तो बुखार कैसे उतरेगा?"
पार्वती - "भगवान उतार देगा।"
दयावती - "नहीं। तुम्‍हें दवा खानी होगी। इस घर के आदमी सभी राक्षस हैं। बहन! तुम्‍हें विश्‍वास न होगा, मैं तुम्‍हारे लिए सारा दिन कुढ़ती रही हूँ। तुम्‍हारे साथ सख्‍ती होती है, तो मेरा दिल रोने लगता है। जी चाहता है, तुम्‍हारे गले से लिपट जाऊँ, पर घरवालों का खयाल रास्‍ते में खड़ा हो जाता है। सोचती हूँ, क्‍या कहेंगे। सौ-सौ बातें बनाएँगे। मगर अब यह बेपरवाई न होगी।"

पार्वनी ने धुँधले दीए की तरफ देखते हुए कहा - "बहन! अब तो जी चाहता है, कुछ खा कर सो रहूँ। सब कुछ देख लिया और क्‍या देखूँगी? अब यह अधोगति नहीं सही जाती। अब तो मौत ही आ जाए।"

दयावती - "अधीर क्‍यों होती हो? यह दिन भी गुजर जाएँगे।"
पार्वती - "प्रारब्‍ध में यह लिखा है, यह मालूम न था। मालूम होता तो जोगिन बन जाती।"
दयावती - "जोगिन बनना इतना आसान होता तो आज संसार में चारों तरफ जोगिनें ही जोगिनें नजर आतीं।"
पार्वती - "आज का हाल तो तुमने स्‍वयं देख लिया होगा। बताओ, मेरा क्‍या दोष है?"
दयावती - "खूब देख लिया, ज्‍यादती सारी उनकी है। तुम्‍हारा दोष नहीं है, इसे सारा जहान जानता है।"
पार्वती - "कहने लगीं, गालियाँ देती है।"
दयावती - "अब लड़कियाँ होती हैं, तो इसमें तुम्‍हारा क्‍या दोष? यह कोई अपने बस की बात थोड़े ही है।"
पार्वती - "वह तो समझते हैं कि यह जान-बूझ कर लड़कियाँ जनती है।"
दयावती - "आदमी को कुछ तो समझना-सोचना भी चाहिए।"
पार्वती - "जब देखो, तने रहते हैं।"
दयावती - "और तुम्‍हारा कोई दोष नहीं।"
पार्वती - "जीना दूभर हो गया। हर समय सहमी रहती हूँ।"
दयावती - "पर मेरी तरफ से मन साफ कर लो। मैं तुम्‍हें बड़ी समझती हूँ।"
पार्वती - "मेरा मन तुमसे पहले ही साफ है।"
दयावती - "मेरे कारण तुम्‍हें जरा भी कष्‍ट न होगा।"

पार्वती ने दयावती को गले लगा लिया और स्‍नेहपूर्ण स्‍वर में कहा - "तूने मुझे बचा लिया। मैं समझती थी, इस घर में मेरे दुश्‍मन ही दुश्‍मन हैं, हितचिंतक कोई नहीं। परंतु तूने मेरा विचार बदल दिया। अब मुझे इतनी शांति है कि कम-से-कम मुझे तू तो बेगुनाह समझती है।"

सहासा दीया बुझ गया। चारों तरफ अंधकार फैल गया। इस अंधकार में पार्वती और दयावती दोनों छिप गईं। क्‍या उनके भाग्य का दीया भी बुझ गया?

*******************

पार्वती महीना भर बीमार रही। दयावती ने सेवा-सुश्रूषा में दिन-रात एक कर दिया। उसे हर समय वही चिंता रहती थी कि पार्वती किसी तरह बच जाए। वह उसके सिरहाने से न उठती। नियत समय पर दवा देती, समय पर दूध। रात को सोते-सोते चौंक उठती और उसे देखती कि सोती है या जागती है। ऐसी चिंता, ऐसी व्‍यग्रता, ऐसी उत्‍सुकता से किसी माँ ने अपने बच्‍चे का इलाज भी कम किया होगा। उसे सास समझाती थी, पति रोकता था, मगर वह किसी की न सुनती थी। कहती, इसकी सेवा मैं करूँगी। य‍ह दुखिया है। इसके मन-मंदिर में प्रेम की जोत जलती है। इसने मेरा मन मोह लिया है। पार्वती की लड़कियाँ दयावती की आवाज सुनतीं तो उनकी तबीयत हरी हो जाती और इस तरह लपक कर आतीं, जैसे वह उनकी माँ हो। उनके रहने-सहने का, खाने-पीने का सब प्रबंध वही करती थी। यह स्‍वर्गीय प्रेम, यह विशुद्ध, निर्मल, पवित्र दृश्‍य देख कर सारा मुहल्‍ला चकित था। ऐसी उदारता, ऐसी श्रद्धा, ऐसी प्रीति इस स्‍वार्थमय संसार में, इस द्वेषपूर्ण दुनिया में उन्‍होंने पहले न देखी थी। सौत को देख कर स्‍त्री के शरीर में आग लग जाती है, उसकी आँखों में क्रोध की चिनगारियाँ निकलने लगती हैं। यहाँ वही सौत सौत की सेवा करती थी। यह प्रेम कितना महान, कितना स्‍वच्‍छ था! इसमें आत्‍मसमर्पण था, विषय-वासना न थी, सेवा का शौक था, फल की इच्‍छा न थी। यह पति-पत्नी का प्रेम न था, दो महिलाओं का स्‍नेह था। यह दो सौतों का प्‍यार न था, दो सखियों की प्रीति थी।

धीरे-धीरे पार्वती की देह में ताकत आने लगी। दयावती ऐसी खुश थी, जैसे कोई राज्‍य जीत लिया हो। अब वह दो सखियाँ थीं, सारा दिन एक जगह बैठी रहीं और बातें करतीं। दयावती सोचती, यह दुखिया है, इससे अन्‍याय हो रहा है। पार्वती सोचती, मेरी सौत है तो क्‍या हुआ, पर इसका दिल प्रेम का सागर है। मुझे देख कर खुश हो जाती है। मेल ने दोनों को प्रेम-सूत्र में बाँध दिया। कुछ देर सखियाँ बनी रहीं, फिर बहनें बन गईं। पार्वती से सास का व्‍यवहार वैसे ही कठोर था, परंतु रामनारायण कभी-कभी हँस कर भी बोल लेते थे। और दयावती सबकी आँखों की पुतली थी।

इसी तरह एक वर्ष बीत गया। पार्वती कुछ महीनों के लिए मायके गई। लौटी तो दयावती की अवस्‍था ही और थी। न गालों पर वह मोहनी थी न आँखों में वह जादू। ऐसा मालूम होता था जैसे दयावती वह दयावती ही नहीं। पार्वती सोलह साल की सुकुमारी को छोड़ गई थी, अब उसे चालीस साल की बुढ़िया मिली। पार्वती पर वज्राघात हुआ। उसने दयावती का हाथ पकड़ा और उसे एकांत में ले गई। वहाँ जाते ही बोली - "यह तुझे क्या हो गया?"

दयावती - "हुआ तो कुछ भी नहीं।"
पार्वती - "पहचानी नहीं जाती। तेरी सूरत ही बदल गई।"
दयावती - "चल झूठी! मुझे छेड़ती है। तेरी आँखें बदल गई होंगी।"
पार्वती - "गालियाँ देती है। जबान भी बदल गई।"
दयावती - "अब तुमसे बातों की बाजी में तो मैं कभी न जीतूँगी।"
पार्वती - "अच्‍छा तो ठीक-ठीक बता दे, छिपाने से कुछ न होगा।"
दयावती - "तुम्‍हारे वहम का इलाज कौन करे?"
पार्वती - "सास से लड़ाई तो नहीं हो गई?"
दयावती - "बिलकुल नहीं। वह मुझे माँ से ज्‍यादा चाहती हैं।"
पार्वती - "उनसे झगड़ा हो गया है?"
दयावती - "वह ऐसे आदमी ही नहीं।"
पार्वती - "बीमार रही है क्‍या?"
दयावती - (हँस कर) "हाँ, बुखार चढ़ता रहा है।"
पार्वती - "तो मालूम हुआ, मुझसे छिपाती है। अब न पूछूँगी।"

दयावती रोने लगी। उसका ऐसा मालूम हुआ कि उसके शरीर को तोड़ कर प्राण-पंछी बाहर निकल जाएगा। सिसकियाँ भरते हुए बोली - "बहन! मुझे कोई रोग नहीं है। मुझसे किसी ने दुर्व्‍यवहार नहीं किया। मुझे चिंता रोग खा रहा है। मुझे भय हो रहा हैं कि यह आदर, प्‍यार, आनंद के दिन कुछ ही दिनों के मेहमान हैं। इस सावन की धूप पर कोई विश्‍वास नहीं। इसकी आयु बहुत थोड़ी है। आज मुझे सब सिर-आँखों पर बैठाते हैं लेकिन यह मान, यह सत्‍कार मेरे लिए नहीं, लड़के के लिए है। उनको लड़के की चाह ने दीवाना बना रखा है। सोचती हूँ अगर मेरे भी लड़की हो गई तो फिर क्‍या होगा? सबकी आँखें बदल जाएँगी। यह चिंता है जो मुझे अंदर-ही-अंदर खा रही है। मैं इस दुख से घुली जा रही हूँ और मुझे विश्‍वास हो गया है कि मेरे लड़की ही होगी और मैं न बचूँगी।"

यह कह कर दयावती रोने लगी। पार्वती के शरीर के रोंगटे खड़े हो गए। उसके मुँह से कुछ न निकला, एक शब्‍द भी नहीं, न हाँ, न ना। उसने दयावती का सिर खींच कर अपने गले से लगा लिया और रोने लगी। मगर उसका दिल कह रहा था - "अगर तू मरी तो मैं भी जीती न रहूँगी।"

आखिर वह दिन आ गया, जिसकी सबको प्रतीक्षा थी। रामनारायण ने दोनों बहनों को बुला भेजा था। एक दाई रखी, एक लेडी डॉक्‍टर। खाना बनाने के लिए एक स्‍त्री अलग थी। लेडी डॉक्‍टर ने कह दिया था लड़का होगा। रामनारायण ऐसे खुश थे जैसे किसी भिखारी को राज-सिंहासन मिल जाए, उछलते फिरते थे। उनके पाँव धरती पर न पड़ते थे। नौकरों से कहा - इनाम मिलेगा। मुहल्‍लेवालों से कहा, मिठाई बाँटेंगे। इष्‍ट मित्रों से भोजन देने की प्रतीक्षा की।

संध्‍या का समय था। रामनारायण के घर में स्त्रियाँ दौड़ती फिरती थीं। कानों पड़ी आवाज सुनाई न देती थी। लेड़ी डॉक्‍टर सख्‍ती के साथ हुक्‍म देती थी और लड़ती थी। मगर कोई बुरा न मानता था। कहीं गरम पानी पड़ा था, कहीं रूई के फाहे कतरे जा रहे थे। पार्वती उड़ी फिरती थी। दिल में प्रार्थना करती थी कि दयावती को लड़का हो, लड़की न हो। अगर लड़की हुई तो हम दोनों की मौत है। अब तो केवल मैं ही अभागिन हॅू, फिर दयावती को भी न पूछेगा। अभी उसकी खातिर कभी-कभी कोई मेरी भी सुध ले लेता है, फिर यह बात भी न रहेगी।

रामनारायण दरवाजे में बैठे माला फेरते थे और प्रार्थना करते थे‍ कि प्रभु! यह नैया पार लगा दे। कभी-कभी यह विचार आता था कि पार्वती से अन्‍याय हुआ है। लड़का हो जाए तो उसके साथ जरा सख्‍ती न करूँ। ऐसी एकाग्रता, ऐसी लगन, ऐसी श्रद्धा से उन्‍होंने कभी प्रार्थना न की थी। संकट हमें परमात्‍मा का भक्‍त बना देता है। वैभव में परमात्‍मा का कभी ध्‍यान ही नहीं आता। एकाएक अंदर से कुछ आवाजें आईं। रामनारायण ने माला के मनके जोर-जोर से फेरने शुरू कर दिए। घबराए हुए कहते थे, परमात्‍मा! कृपा करो। तुम्‍हारे बिना और किसी का सहारा नहीं। इतने में रामनारायण की माँ आ कर दरवाजे पर खड़ी हो गई। रामनारायण ने कहा - "क्‍या हुआ?"

माँ ने धीरे से जवाब दिया - "लड़की।"

रामनारायण की उठती हुई उमंगें बैठ गईं। जैसे कबूतर उड़ना चाहता है और बाज को ऊपर मँडराते देख कर फिर वहीं बैठ जाता है। उन्‍होंने माला धरती पर पटक दी और निराशा से इधर-उधर टहलने लगे। किसी सेठ को अपना सर्वस्‍व लुट जाने पर इतना दुख न होता।

थोड़ी देर बाद दयावती के पास लेडी डॉक्‍टर और पार्वती के सिवा कोई भी न था। सब रामनारायण के गिर्द जमा थे। कोई शोक प्रकट करता था, कोई सांत्‍वना देता था। मगर रामनारायण बिल्‍कुल चुप थे। चारों तरफ देखते थे और ठंडी साँसें भरते थे। दयावती का किसी को भी खयाल न था।

सहसा पार्वती कमरे में आई और बोली - "दयावती मर गई।"

रामनारायण बैठे थे, "नवजात लड़की की भी कोई आशा नहीं।"

सारे घर में कुहराम मच गया। रामनारायण, उनकी माँ, उनकी बहनें सब रोने लगीं। उनके आर्तनाद से दुश्‍मनों के कलेजे भी छलनी होते थे। इस तरह रोती थीं जैसे उनका लड़का मर गया है। केवल पार्वती की आँख में पानी न था। वह कहती थी, कैसे छलिए हैं। दिल में दया नहीं, आँख में आँसू हैं। परमात्‍मा करे, ऐस धोखेबाजों के यहाँ कभी संतान न हो।

दूसरे दिन दयावती और उसकी लड़की दोनों की अर्थी उठी। घर के सब लोग साथ थे, केवल पार्वती न थी। उसे रात ही बुखार हो गया था। रामनारायण ने लड़कियों को उसके पास छोड़ा और स्‍वयं अर्थी के साथ चले गए।

दाह-कार्य करके लौटे तो घर में पार्वती की लाश पड़ी थी। और उसके पास उसकी अबोध कन्‍याएँ बैठी फूट-फूट कर रो रही थीं। उसने दयावती से कहा था, एकसाथ जिएँगी, एकसाथ मरेंगी। उसका वचन झूठा न निकला। वह दाह-कर्म के समय पछड़ गई थी, परंतु परलोक यात्रा में पीछे न रही। दोनों विपदाग्रस्‍त स्त्रियाँ एक ही दिन दुनिया से रवाना हुईं।

सुदर्शन


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Milan Tomic

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