हिन्दी साहित्य को सम्मानित करने की कोशिश में एक छोटा सा प्रयास, हिन्दी की श्रेठ कविताओं, ग़ज़लों, कहानियों एवं अन्य लेखों को एक स्थान पर संकलित करने की छोटी सी कोशिश...

Amrita Pritam - Ek Jeevi, Ek Ratri, Ek Sapna | अमृता प्रीतम - एक जीवी, एक रत्नी, एक सपना | Story

पालक एक आने गठ्ठी, टमाटर छह आने रत्तल और हरी मिर्चें एक आने की ढेरी "पता नहीं तरकारी बेचनेवाली स्त्री का मुख कैसा था कि मुझे लगा पालक के पत्तों की सारी कोमलता, टमाटरों का सारा रंग और हरी मिर्चों की सारी खुशबू उसके चेहरे पर पुती हुई थी।

एक बच्चा उसकी झोली में दूध पी रहा था। एक मुठ्ठी में उसने माँ की चोली पकड़ रखी थी और दूसरा हाथ वह बार-बार पालक के पत्तों पर पटकता था। माँ कभी उसका हाथ पीछे हटाती थी और कभी पालक की ढेरी को आगे सरकाती थी, पर जब उसे दूसरी तरफ बढ़कर कोई चीज़ ठीक करनी पड़ती थी, तो बच्चे का हाथ फिर पालक के पत्तों पर पड़ जाता था। उस स्त्री ने अपने बच्चे की मुठ्ठी खोलकर पालक के पत्तों को छुडात़े हुए घूरकर देखा, पर उसके होठों की हँसी उसके चेहरे की सिल्वटों में से उछलकर बहने लगी। सामने पड़ी हुई सारी तरकारी पर जैसे उसने हँसी छिड़क दी हो और मुझे लगा, ऐसी ताज़ी सब्जी कभी कहीं उगी नहीं होगी।

Wasim Barelvi - Mohabbat Ke Dino Ki Yahi Kharabi hai | वसीम बरेलवी - मुहब्बतों के दिनों की यही ख़राबी है | Ghazal

वसीम बरेलवी का नाम ग़ज़ल की दुनिया में किसी परिचय का मोहताज़ नहीं है। उनकी दिल को छूती ग़ज़लें ही उनका परिचय है। वसीम साहब बरेली (उत्तर प्रदेश) में रुहेलखंड विश्वविद्यालय में उर्दू विभाग में प्रोफ़ेसर हैं। हिंदी कला आज आपके लिए प्रस्तुत कर रहे है उनकी एक बहुत मशहूर ग़ज़ल 'मुहब्बतों के दिनों की यही ख़राबी है'

Rahat Indori - Bulati Hai Magar Jane Ka Nai | राहत इन्दौरी - बुलाती है मगर जाने का नईं | Ghazal

राहत इन्दौरी की यह ग़ज़ल मुझे बेहद पसंद है, इसमें सो 'नई' शब्द का प्रयोग हुआ है उसका मतलब 'नया' नहीं, उसका मतलब 'नहीं' है क्योंकि कुछ सालो पहले ग़ज़ल में 'नहीं' का उच्चारण 'नई' होता था।  राहत साब ने इस ग़ज़ल में उसी उच्चारण का प्रयोग किया है, इसलिए आपसे आग्रह है इसको पढ़ते समय इसे 'नाई' करके पढे।  

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