हिन्दी साहित्य को सम्मानित करने की कोशिश में एक छोटा सा प्रयास, हिन्दी की श्रेठ कविताओं, ग़ज़लों, कहानियों एवं अन्य लेखों को एक स्थान पर संकलित करने की छोटी सी कोशिश...

Saadat Hasan Manto - License | सआदत हसन मंटो - लाइसेंस

अब्बू कोचवान बड़ा छैल-छबीला था। उसका तांगा-घोड़ा भी शहर में नंबर वन था। वह कभी मामूली सवारी नहीं बिठाता था। उसके लगे-बंधे गाहक थे, जिनसे उसको रोजाना 10-15 रुपए वसूल हो जाते थे, जो उसके लिए काफ़ी थे। दूसरे कोचवानों की तरह उसे नशा-पानी की आदत नहीं थी, लेकिन साफ़-सुथरे कपड़े पहनने और हर वक़्त बांका बने रहने का उसे बेहद शौक था।
जब उसका तांगा किसी सड़क पर से घुंघरू बजाता हुआ गुज़रता तो लोगों की आंखें ख़ुद ब ख़ुद उसकी तरफ़ उठ जातीं: “वह बांका अब्बू जा रहा है….देखो तो किस ठाट से बैठा है….ज़रा पगड़ी देखो, कैसी तिरछी बंधी है…”

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